जिसे कोई दबाना चाहे या रुकवाना चाहे, उसे न्यूज़ कहते है, वरना बाकि सब विज्ञापन है: पीके वर्मा 

  • [By: PK VERMA || 2026-06-03 21:54 IST
जिसे कोई दबाना चाहे या रुकवाना चाहे, उसे न्यूज़ कहते है, वरना बाकि सब विज्ञापन है: पीके वर्मा 

एक बार मुझसे मुझसे पूछा गया की ख़बर क्या होती है। न्यूज़ क्या होती है। तो मेरा ज़वाब था: जिसे कोई दबाना चाहे, जिसे कोई रुकवाना चाहे। जिससे किसी की रातों की नींद उड़ जाएं उसे न्यूज़ कहते है। वार्ना बाकि सब विज्ञापन है। 

पत्रकारिता दिवस का यह दिन हमें पत्रकारिता के महत्व, उसकी जिम्मेदारियों और लोकतंत्र में उसकी भूमिका का स्मरण कराता है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ-साथ पत्रकारिता भी समाज को दिशा देने का महत्वपूर्ण कार्य करती है। एक सच्चा पत्रकार केवल समाचार नहीं देता, बल्कि समाज की समस्याओं को सामने लाता है, जनता की आवाज़ को शासन तक पहुँचाता है और सत्ता से सवाल पूछकर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करता है।

आज के डिजिटल युग में सूचना का प्रवाह बहुत तेज हो गया है। सोशल मीडिया और इंटरनेट ने खबरों को हर व्यक्ति तक तुरंत पहुंचाने का काम किया है। लेकिन इसके साथ ही फेक न्यूज़, अफवाहों और भ्रामक सूचनाओं की चुनौती भी बढ़ी है। ऐसे समय में पत्रकारों की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है कि वे तथ्यों की जांच कर सत्य एवं निष्पक्ष समाचार जनता तक पहुंचाएं।

पत्रकारिता केवल एक प्रोफेशन नहीं, बल्कि समाज सेवा का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। अनेक पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर सच को सामने लाने का कार्य करते हैं। प्राकृतिक आपदाओं, युद्धों, महामारी और सामाजिक संकटों के दौरान पत्रकारों ने हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहकर जनता को सही जानकारी उपलब्ध कराई है। उनके साहस और समर्पण को हम सभी नमन करते हैं।

आज सबसे बड़ी जरुरत इस बात की है कि पत्रकारिता निष्पक्ष, निर्भीक, तथ्यपरक और जनहितकारी बनी रहे। पत्रकारों को सत्य, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व के मूल्यों को सर्वोपरि रखना चाहिए। साथ ही समाज को भी जिम्मेदार नागरिक बनकर सही और प्रमाणिक समाचारों का समर्थन करना चाहिए।

आइए, पत्रकारिता दिवस के अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि सत्य, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में अपना योगदान देंगे तथा स्वतंत्र और जिम्मेदार पत्रकारिता को मजबूत बनाने का प्रयास करेंगे।

आज पत्रकारिता दिवस के अवसर पर मैं पत्रकारिता की भूमिका, उसकी चुनौतियों और उसके भविष्य पर अपने विचार व्यक्त करना चाहता हूँ।

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। इसका मूल उद्देश्य सत्ता की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि सत्ता से प्रश्न पूछना है। पत्रकार का धर्म किसी राजनीतिक दल, सरकार, उद्योगपति या विचारधारा के प्रति निष्ठावान होना नहीं, बल्कि सत्य के प्रति निष्ठावान होना है।

आज जब हम पत्रकारिता की बात करते हैं, तो हमें उसकी वर्तमान स्थिति पर भी विचार करना चाहिए। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता सूचकांकों में भारत की रैंकिंग पिछले वर्षों में चिंता का विषय रही है। आलोचकों का कहना है कि पत्रकारों पर मुकदमे, दबाव, धमकियाँ और आर्थिक निर्भरता जैसी चुनौतियाँ स्वतंत्र पत्रकारिता को प्रभावित करती हैं। दूसरी ओर सरकार का तर्क है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और फर्जी खबरों पर नियंत्रण के लिए कुछ कदम आवश्यक हैं। इस बहस के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि पत्रकारिता कितनी स्वतंत्र और निर्भीक रह पाती है।

एक स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार और पत्रकारिता के बीच संबंध सहयोग का नहीं, बल्कि जवाबदेही का होना चाहिए। पत्रकार का काम सरकार गिराना या बनाना नहीं है; उसका काम जनता को सही जानकारी देना है ताकि जनता स्वयं निर्णय ले सके। दुर्भाग्य से आज पत्रकारिता का एक हिस्सा टीआरपी, क्लिक और सनसनीखेज खबरों की दौड़ में फंसता दिखाई देता है। कई बार खबरों की जगह बहसों का शोर और तथ्यों की जगह आरोप-प्रत्यारोप दिखाई देते हैं। ऐसी स्थिति में पत्रकारिता का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।

एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार को पाँच सिद्धांत कभी नहीं भूलने चाहिए:

  1. सत्यनिष्ठा। खबर वही प्रकाशित हो जो तथ्यों पर आधारित हो।
  2. निष्पक्षता। पत्रकार को किसी दल, जाति, धर्म या व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में नहीं खड़ा होना चाहिए।
  3. साहस। जब सत्ता, पूंजी या भीड़ का दबाव हो, तब भी सच कहने का साहस होना चाहिए।
  4. संवेदनशीलता। किसी पीड़ित, गरीब या कमजोर व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुँचाए बिना रिपोर्टिंग करनी चाहिए।
  5. जवाबदेही। यदि कोई गलती हो जाए तो उसे स्वीकार करने और सुधारने का नैतिक साहस भी होना चाहिए।

एक बार महात्मा गांधी ने कहा था कि पत्रकारिता का उद्देश्य जनता की सेवा है। यदि पत्रकारिता सत्ता के सामने झुक जाए, तो लोकतंत्र कमजोर हो जाता है। लेकिन यदि पत्रकारिता जिम्मेदारी भूलकर केवल सनसनी फैलाने लगे, तब भी लोकतंत्र को नुकसान होता है। इसलिए स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व, दोनों का संतुलन आवश्यक है।

आज पत्रकारिता दिवस पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि पत्रकारिता को सत्ता का प्रचारक नहीं, बल्कि समाज का प्रहरी बनाए रखेंगे; पत्रकारिता को व्यवसाय से ऊपर उठाकर जनसेवा का माध्यम बनाए रखेंगे; और सच को सच कहने का साहस कभी नहीं छोड़ेंगे। क्योंकि जब पत्रकारिता स्वतंत्र होती है, तब लोकतंत्र मजबूत होता है। और जब लोकतंत्र मजबूत होता है, तब राष्ट्र प्रगति करता है। पत्रकारों को यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए:
"कलम की ताकत तलवार से अधिक होती है, बशर्ते वह सत्य और जनहित के लिए उठे।"

एक और अहम् बात कहना चाहता हूँ:

"पत्रकार का काम सत्ता के साथ खड़ा होना नहीं, बल्कि सत्य के साथ खड़ा होना है। लोकतंत्र तभी जीवित रहता है, जब प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता जीवित रहती है। और पत्रकारिता तभी सम्मानित होती है, जब वह निर्भीक, निष्पक्ष और जनहित के प्रति समर्पित होती है।"

यह बात भी सदैव याद रखें:

"कलम बिक जाए तो खबर मर जाती है, खबर मर जाए तो लोकतंत्र कमजोर हो जाता है। इसलिए पत्रकार का पहला धर्म सत्य और जनता के प्रति निष्ठा है। जब सत्ता शक्तिशाली और अहंकारी हो जाती है, तब लोकतंत्र को एक निर्भीक पत्रकार की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। समाचार का पहला दायित्व सत्य के प्रति है, और पत्रकार का पहला दायित्व जनता के प्रति।"

उम्मीद करता हूँ कि सत्य, निष्पक्षता और निर्भीकता की आपकी कलम सदैव जनहित की आवाज़ बनकर आगे बढ़ती रहे।


पत्रकारिता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
जय हिन्द!

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