NEET पेपर लीक विवाद: जंतर-मंतर पर छात्रों का आक्रोश, लाठीचार्ज और लोकतंत्र के सामने खड़े बड़े सवाल

  • [By: PK VERMA || 2026-07-24 00:38 IST
NEET पेपर लीक विवाद: जंतर-मंतर पर छात्रों का आक्रोश, लाठीचार्ज और लोकतंत्र के सामने खड़े बड़े सवाल

विशेष रिपोर्ट | Asian Express Live | नई दिल्ली

देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर युवाओं की आवाज़ का केंद्र बना। NEET परीक्षा में कथित पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में अनियमितताओं को लेकर बड़ी संख्या में छात्र और अभ्यर्थी वहां एकत्र हुए। कई छात्र अनशन पर बैठे और सरकार से निष्पक्ष जांच, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई तथा परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की मांग करने लगे।

लेकिन यह प्रदर्शन उस समय विवादों में आ गया जब प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए पुलिस कार्रवाई हुई। छात्रों और कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने लाठीचार्ज तथा बल प्रयोग के आरोप लगाए, जबकि दिल्ली पुलिस का कहना है कि उसने कानून-व्यवस्था बनाए रखने और लागू नियमों का पालन कराने के लिए आवश्यक कदम उठाए।

युवाओं का सवाल—इतना बड़ा पेपर लीक कैसे हो गया: देश के लाखों छात्र वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं। परिवार अपनी जमा-पूंजी खर्च कर बच्चों को डॉक्टर बनाने का सपना देखते हैं। ऐसे में जब परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि पूरे चयन तंत्र की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। NEET विवाद के बाद जांच एजेंसियों ने कई राज्यों में कार्रवाई की, गिरफ्तारियां हुईं और कथित संगठित नेटवर्क की जांच शुरू हुई। इन घटनाओं ने यह प्रश्न उठाया कि इतनी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय परीक्षा की सुरक्षा व्यवस्था में चूक कैसे हुई।

क्या नैतिक जिम्मेदारी तय होगी: विपक्षी दलों और कई छात्र संगठनों ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की मांग की। उनका तर्क है कि जब लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ है, तो राजनीतिक जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कहना है कि जांच जारी है, दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और शिक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने के लिए सुधारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार का यह भी कहना है कि केवल आरोपों के आधार पर किसी मंत्री का इस्तीफा मांगना उचित नहीं है।

जंतर-मंतर पर निहत्थे छात्र-छात्राओं पर पुलिस कार्रवाई: प्रदर्शनकारी छात्रों का आरोप है कि वे शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगें रख रहे थे, लेकिन उन्हें जबरन हटाया गया। कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिनमें पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की दिखाई दी। इन वीडियो की अलग-अलग व्याख्याएं की गईं और घटनाक्रम को लेकर तीखी बहस शुरू हो गई। पुलिस का पक्ष है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है और कार्रवाई नियमों के अनुसार की गई।

सोनम वांगचुक का मुद्दा भी बना चर्चा का विषय: प्रसिद्ध इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को भी प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा हटाए जाने और हिरासत में लिए जाने की खबरों ने इस आंदोलन को और व्यापक चर्चा का विषय बना दिया। उनके समर्थकों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रश्न बताया, जबकि प्रशासन ने कहा कि सभी कार्रवाई कानून के अनुसार की गई।

लोकतंत्र की असली परीक्षा: लोकतंत्र की शक्ति केवल चुनावों में नहीं, बल्कि इस बात में भी होती है कि नागरिक बिना भय के अपनी बात रख सकें और सरकार उनकी बात सुनने का प्रयास करे। यदि छात्र शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांग रख रहे थे, तो संवाद प्राथमिक विकल्प होना चाहिए। वहीं यदि कानून-व्यवस्था की वास्तविक चुनौती उत्पन्न हुई थी, तो प्रशासन का कर्तव्य था कि वह सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करे। इन दोनों दावों की निष्पक्ष जांच ही सच्चाई सामने ला सकती है।

युवाओं का भरोसा सबसे बड़ी पूंजी: सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल परीक्षा आयोजित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि हर अभ्यर्थी को परीक्षा की निष्पक्षता पर पूरा विश्वास हो। इसी प्रकार, प्रदर्शन करने वाले नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि वे कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रखें। जब करोड़ों युवाओं का भविष्य दांव पर हो, तब पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशील संवाद किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।

हमारी बात: NEET विवाद ने केवल परीक्षा प्रणाली पर प्रश्न नहीं उठाए हैं, बल्कि शासन, जवाबदेही और लोकतांत्रिक संवाद की गुणवत्ता पर भी बहस छेड़ दी है। यदि परीक्षा में अनियमितताएं हुईं, तो दोषियों को कठोरतम दंड मिलना चाहिए। यदि पुलिस कार्रवाई आवश्यकता से अधिक थी, तो उसकी भी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। और यदि सरकार ने सुधारात्मक कदम उठाए हैं, तो उन्हें पारदर्शी ढंग से जनता के सामने रखना चाहिए।

युवा केवल न्याय चाहते हैं, राजनीतिक नारे नहीं: लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सत्ता कठिन प्रश्नों का उत्तर तथ्यों से दे और नागरिक अपनी आवाज़ संविधान के दायरे में उठाएं। देश का भविष्य संसद की बहसों से नहीं, बल्कि उन परीक्षा कक्षों से तय होगा, जहां करोड़ों युवा अपने सपनों के साथ बैठते हैं। उन सपनों की रक्षा करना पूरे राष्ट्र की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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