अन्य अधिकारी को प्रभारी बनाकर लेखाधिकारी के हस्ताक्षर की शर्त की पूर्ति करना ग़ैरक़ानूनी

  • [By: PK VERMA || 2026-07-22 23:51 IST
अन्य अधिकारी को प्रभारी बनाकर लेखाधिकारी के हस्ताक्षर की शर्त की पूर्ति करना ग़ैरक़ानूनी

मेरठ। इन दिनों नगर निगम में नगरायुक्त की खुलकर मनमानी चल रही है। पूरे शहर की सड़के खुदी पड़ी है। बेहद घटिया निर्माण कार्य किया जा रहा है। बेहद खराब क्वालिटी की निर्माण सामग्री इस्तेमाल की जा रही है। कई जगह तो निर्माण कार्य पूरा करने के समय सीमा भी खत्म हो चुकी है। रोज शिकायतें हो रही है। लेकिन नगरायुक्त कुछ करने को तैयार नहीं। 

नगरायुक्त की मनमर्जी और नियमविरुद्ध कार्य करने का एक नया मामला सामने आया है। चीफ फाइनेंस कंट्रोलर का ट्रांसफर होने के बाद चीफ फाइनेंस कंट्रोलर/लेखाधिकारी की कुर्सी खाली हो गई। तो लेखाधिकारी कृष्ण बिहारी पाठक के होने के बावजूद नगरायुक्त ने नियमों को ताक पर रख कर दर्जन भर चार्ज/विभाग के प्रभारी अपर नगरायुक्त पंकज कुमार सिंह को सह प्रभारी लेखा का अतिरिक्त प्रभार दे दिया और मौजूदा लेखाधिकारी को बाईपास कर दिया। नगरायुक्त के इस आदेश से भ्रष्टाचार की बू आ रही है। इसकी शिकायत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से की गई है और सूचना के अधिकार में पूछा गया है कि नगर निगम नियमावली के किस एक्ट/धारा के तहत मौजूदा लेखाधिकारी को बाईपास करके अपर नगरायुक्त को भुगतान की फाइलों पर हस्ताक्षर करने का अधिकार दिया है जबकि लेखाधिकारी के हस्ताक्षर से ही भुगतान किया जा सकता है। यह उच्च स्तरीय जांच का विषय है।

क्या कहती है नगर निगम नियमावली: नगर निगम नियमावली 37(1) के अनुसार लेखाधिकारी का पदनाम अनिवार्य है, किसी अन्य अधिकारी को प्रभारी बनाकर लेखाधिकारी के हस्ताक्षर की शर्त की पूर्ति करना ग़ैरक़ानूनी है। और नगरायुक्त का यह आदेश सीधा-सीधा नियम 37(1) का उल्लंघन है। 

नियम 37(1) के अनुसार नगर निगम की निधि से किसी धनराशि का भुगतान बिना ऐसे चेक के नहीं किया जाएगा जिस पर नगर आयुक्त और लेखाधिकारी के हस्ताक्षर हों। लेखाधिकारी को बायपास कर सारी पत्रावलियां अपर नगर आयुक्त के माध्यम से मंगवाई जा रही हैं। इस तरह से लेखाधिकारी की स्वतंत्र भूमिका को समाप्त कर दिया गया है। एक अहम् बात और इस नियमावली में "लेखाधिकारी" लिखा है, "प्रभारी लेखानुभाग" नहीं। अर्थात लेखाधिकारी के होते हुए सह प्रभारी लेखा चेक पर हस्ताक्षर नहीं कर सकता। 

नगर नियम की इस नियमावली के अनुसार, लेखाधिकारी एक वैधानिक पद है। और अपर नगर आयुक्त एक प्रशासनिक पद है। विभाग में वैधानिक पद के अधिकार प्रशासनिक आदेश से नहीं छीने जा सकते। यह सरासर ग़लत है। 

सुप्रीम कोर्ट का सिद्धांत: सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के अनुसार इस तरह से किसी को उसकी शक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। बेरियम कैमिकल्स लिमिटेड बनाम कंपनी लॉ बोर्ड —

"जहां कानून किसी विशिष्ट अधिकारी को शक्ति देता है, वहां वह शक्ति किसी अन्य को हस्तांतरित नहीं की जा सकती।"

क्या नगरायुक्त के पास ऐसा करने का अधिकार है: दरअसल नगर निगम नियमावली के अनुसार नगरायुक्त के पास ऐसी शक्ति या अधिकार नहीं है। धारा 107, नगर निगम अधिनियम 1959: नगर आयुक्त को "कार्यपालिका प्रशासन" की शक्ति है, "वित्तीय नियंत्रण" की नहीं। वित्तीय नियंत्रण लेखाधिकारी का स्वतंत्र क्षेत्र है।

नगर निगम नियम 35(1) के अनुसार: लेखानुभाग का प्रशासनिक नियंत्रण लेखाधिकारी में निहित है। नगर आयुक्त "प्रभारी" बनाकर उसे ओवरराइड नहीं कर सकता। अपर नगर आयुक्त खुद योजनाएं बनाता है, भुगतान प्रस्तावित करता है। अब वही जांच भी करेगा। ये हितों का टकराव है। CAG इसे गंभीर वित्तीय अनियमितता मानेगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: प्रदेश के उच्च न्यायालय के नगर निगम कानपूर बनाम स्टेट ऑफ़ उत्तर प्रदेश 2019 में दिए गए एक आदेश के अनुसार,

"नियम 37(1) में लेखाधिकारी का पदनाम अनिवार्य है। किसी अन्य अधिकारी को प्रभारी बनाकर लेखाधिकारी के हस्ताक्षर की शर्त पूरी नहीं होती।"

धारा 409 IPC का खतरा: इस आदेश के तहत कोई भुगतान हुआ तो आपराधिक न्यास भंग। इसके लिए नगर आयुक्त एवं अपर नगर आयुक्त दोनों आरोपी बनेंगे। नियम विरुद्ध भुगतान: स्थानीय निधि लेखा परीक्षा में ये "नियम विरुद्ध भुगतान" माना जाएगा। रिलीज़ की गई पूरी धनराशि की रिकवरी नगर आयुक्त से होगी।

लेखाधिकारी को किया बाईपास: नगर आयुक्त द्वारा शासन से भेजे गए लेखाधिकारी को बाईपास करके अपर नगरायुक्त पंकज कुमार सिंह को भुगतान की फाइलें पारित करने के लिये अधिकृत कर दिया जबकि यह आदेश नियम 37(1), लेखा नियमावली 1960 का सीधा उल्लंघन है। दरअसल नगरायुक्त ने अपने आदेश में नियमित लेखाधिकारी को साइड में बैठाकर भुगतान की शक्ति अपर नगरयुक्त को दे दी है। नगरायुक्त ने अपने आदेश में लिखा है: 

"श्री कृष्ण बिहारी पाठक लेखाधिकारी नगर निगम निधि से सम्बन्धित समस्त पत्रावलियाँ अपर नगर आयुक्त/ वरिष्ठ प्रभारी लेखानुभाग के माध्यम से अधोहस्ताक्षरी के समक्ष प्रस्तुत करना सुनिश्चित करें।"

इसका सीधा-सीधा मतलब है कि नियमित लेखाधिकारी को साइड हटाकर अपर नगर आयुक्त पंकज कुमार को "वरिष्ठ प्रभारी लेखानुभाग" बनाया गया। इतना ही नहीं लेखाधिकारी को आदेश दिया गया कि भुगतान की तमाम फाइलें अपर नगर आयुक्त के माध्यम से भेजे। अर्थात भुगतान की पूरी चेन से लेखाधिकारी को हटाकर अपर नगर आयुक्त को बैठा दिया। यह एक बड़ा षड्यंत्र है और यह सीधे सीधे भ्रष्टाचार की और ईशारा करता है।

ग़ौरतलब है कि अपर नगरायुक्त पंकज कुमार सिंह पर नगर निगम के आधे से ज्यादा विभागों का चार्ज है। इन पर 17 विभागों की जिम्मेदारी है। निगम ऑफिस में महीने में शायद ही कभी बैठते हो। तमाम पत्रावलियां अपने आवास पर ही मंगाते है। जिसके चलते कई बार अपनी परेशानियों को लेकर नागरिक इन्हे निगम में ढूंढते रहते है लेकिन अपर नगरायुक्त कभी किसी परेशान नागरिक से नहीं मिलते। इन्होने इतने सारे विभाग घेर रखे है कि इन्हे आम आदमी और उनकी परेशानियों से कोई मतलब नहीं, कोई सरोकार नहीं। इनका सारा फोकस केवल मलाईदार फाइलों में रहता है। एशियन एक्सप्रेस लाइव के वरिष्ठ संवाददाता कई बार निगम स्थित ऑफिस में ख़बरों के बाबत बाईट लेने गए लेकिन कई महीनो से अपर नगरायुक्त कभी भी अपनी सीट नहीं मिलें। अपर नगरायुक्त पंकज कुमार सिंह पर नगर निगम के आधे से ज्यादा विभागों के चार्ज है।

अपर नगरायुक्त पर अब सह वरिष्ठ प्रभारी लेखा का भी चार्ज: इस प्रकार सारे नियमों को धता बताकर अपर नगरायुक्त की मेहरबानी और अनुकंपा से अपर नगरायुक्त पंकज कुमार सिंह को निगम के ख़जाने का भी रखवाला बना दिया है। यानी निगम में पहले से ही मौजूद लेखाधिकारी को बाईपास कर अपर नगरायुक्त पंकज कुमार सिंह को लेखा विभाग का सह वरिष्ठ प्रभारी लेखा की बड़ी और मलाईदार कुर्सी दे दी गई। अब इन अपर नगरायुक्त से पहले से ही 15 विभागों का भार है जिनके साथ वह न्याय नहीं कर पा रहे, समय नहीं दे पा रहे है। ग़ौरतलब है कि गत वर्ष नगर स्वास्थ्य अधिकारी डॉ हरपाल के पास भी जरुरत अधिक विभागों का जिम्मा था, और उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ी थी।

लेखाधिकारी का कक्ष बंद: लेखाधिकारी कृष्ण बिहारी पाठक एक दिन मुख्य लेखाधिकारी के केबिन में बैठे तो बाहर अपर नगरायुक्त पंकज कुमार ने अपने नाम की नेमप्लेट लगवा दी और केबिन पर ताला लगवा दिया। तो लेखाधिकारी कृष्ण बिहारी पाठक ताला लगे केबिन के बाहर कुर्सी डाल कर बैठ गए। इस पर नगरायुक्त सौरभ गंगवार ने दोनों अधिकारियों को अपने अपने ऑफिस में बैठने के निर्देश दे दिए। इस निर्देश के बाद कृष्ण बिहारी पाठक तो अपने पुराने ऑफिस में बैठने लगे। लेकिन पंकज कुमार सिंह आदतन अपने ऑफिस में नहीं बैठे। उन्हें तमाम फ़ाइल अपने आवास ही मंगाने की पुरानी आदत हैं। जबकि लेखाधिकारी के कक्ष पर ताला जड़ दिया गया है। 

नगर आयुक्त सौरभ गंगवार के पास एक उम्दा और रटा-रटाया जवाब तैयार है,

"मुख्य वित्त एवं लेखाधिकारी का ट्रांसफर हो गया, इसलिए यह व्यवस्था की।"

वैसे तो नगरयुक्त ऐसे पत्रकारों से नहीं मिलते और न ही उनका फोन उठाते है जो उनसे निगम की गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार के बाबत सवाल पूछता है। हमारा भी कभी फोन नहीं उठाया और न ही वहटसप्प मैसेज का ज़वाब दिया। लेकिन नगरायुक्त के इस "मुख्य वित्त एवं लेखाधिकारी का ट्रांसफर हो गया, इसलिए यह व्यवस्था की" का संवैधानिक जवाब कुछ इस तरह से होगा:

"ट्रांसफर होने पर नए लेखाधिकारी की तैनाती या प्रभारी लेखाधिकारी नियुक्त होता है। अपर नगर आयुक्त को लेखानुभाग का प्रभार देना अवैध है। शासनादेश संख्या 2648/नौ-9-2018-18ज/2016 दिनांक 04-09-2018 में स्पष्ट है कि लेखाधिकारी का प्रभार केवल वित्त सेवा संवर्ग के अधिकारी को ही दिया जा सकता है। अगर शासन कहता है कि नियम 37(1) में बदलाव नहीं हुआ, तो ये आदेश अपने आप अवैध साबित।"

और आखिर में सिर्फ एक बात: नगरायुक्त मेरठ का आदेश सीधा-सीधा नगर निगम नियम 37(1) का उल्लंघन है। यह लेखाधिकारी के वैधानिक अधिकारों का हनन है। और सबसे बड़ी बात नगर आयुक्त सौरभ गंगवार ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश दिया है। ये आदेश शून्य है। इसके तहत किया गया कोई भी भुगतान अवैध होगा। और भविष्य में इन तमाम भुगतानों की रिकवरी नगरायुक्त से ही होगी। 

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